लोक वाद्ययंत्रों के संरक्षण संवर्धन एवं लोकधुन कार्यशाला में दूसरे दिन बन्दना गर्ब्यांल,पद्मश्री प्रीतम भरतवाण तथा कुलदीप गैरोला हुए शामिल

देहरादून

15 से 17 अक्टूबर तक तीन दिवसीय समग्र शिक्षा उत्तराखण्ड के तत्वावधान में लोक वाद्ययंत्रों के संरक्षण संवर्धन एवं नई पीढ़ी को हस्तान्तरण हेतु लोकधुन कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। कार्यक्रम का शुभारम्भ बृहस्पतिवार को SCERT के प्रेक्षागृह में बन्दना गत्यर्याल निदेशक अकादमिक शोध एवं प्रशिक्षण, पद्मश्री प्रीतम भरतवाण तथा कुलदीप गैरोला, अपर राज्य परियोजना निदेशक समग्र शिक्षा के द्वारा किया गया।

कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य अपने लोक वाद्ययंत्रों की लोक धुनों को विद्यालयों में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं तक पहुँचाना है जिसके तहत राज्य के प्रत्येक विकासक्षेत्र के 4 (चार) सर्वाधिक छात्र संख्या वाले माध्यमिक विद्यालयों को वायंत्र उपलब्ध करवाने व उनके प्रशिक्षक हेतु धनराशि स्वीकृत की जायेगी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) -2020 स्कूली बच्चों के बीच स्थानीय भाषाओं, कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए कई पहल का सुझाव देती है।

ब्लॉक स्तर पर 200 से अधिक नामांकन वाले माध्यमिक शिक्षा के 04 विद्यालयों (कक्षा 6-12) को प्राथमिकता के आधार पर स्थानीय वाद्य यंत्रों (ढोल, दमाऊं, मुसकीन आदि) की खरीद हेतु बजट उपलब्ध कराया जाएगा। बैंड वाद्य यंत्रों की खरीद केंद्रीयकृत प्रणाली के माध्यम से की जा सकेगी।

कार्यक्रम की परिकल्पना कुलदीप गैरोला अपर निदेशक अकादमिक शोध एवं प्रशिक्षण की है।

उन्होने बताया कि लोकधुन हमारी विविध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और प्रदर्शन का एक अभिनव प्रयास है। स्थानीय वाद्ययंत्रों में अनूठी ध्वनियों और तकनीकें होती हैं जो समुदायों के इतिहास, मूल्यों और परंपराओं को दर्शाती हैं। स्कूलों में वाद्ययंत्रों और सांस्कृतिक जागरूकता को शामिल करने से छात्रों में रचनात्मकता, अनुशासन और सांस्कृ तिक जागरूकता को बढ़ावा मिलेगा।

वाद्ययंत्र सीखने से संज्ञानात्मक विकास, शिक्षण कार्य और आत्म-अभिव्यक्ति में वृद्धि होती है। विविध संगीत परंपराओं का समावेश विभिन्न संस्कृ तियों के प्रति सम्मान और प्रशंसा को बढ़ावा देता है, जिससे छात्रों के राष्ट्रीय दृष्टिकोण का विस्तार होता है। गौरतलब है कि संगीत बैंड प्रतियोगिता हर साल आयोजित की जाती है।

इसलिए जिस स्कूल के लिए स्थानीय संगीत वाद्ययंत्र खरीदा जाएगा, वह संगीत वाद्ययंत्र के साथ बैंड प्रतियोगिता में भाग ले सकता है।

स्थानीय उपकरण उपलब्ध कराने के अलावा, स्थानीय विशेषज्ञों को मानदेय और सामुदायिक योगदान के आधार पर प्रशिक्षण के लिए नियुक्त किया जाएगा। प्रशिक्षक का चयन जिला/राज्य समग्र शिक्षा प्राधिकरण द्वारा निर्धारित पात्रता मानदंडों के अनुसार एसएमसी द्वारा किया जाएगा।

पात्रता मानदंडों का निर्धारण तीन दिवसीय कार्यशाला में प्रतिभाग कर रहे कलाकारों एवं शिक्षकों द्वारा प्रस्तावित किया जायेगा।

कार्यशाला के उद्घाटन अवसर पर प्रथम दिन राज्य के सुप्रसिद्ध लोकगायक जागर सम्राट पद्मश्री प्रीतम भरतवाम, डॉ. सोहनलाल, प्रेम हिन्दवाल व रमेश जगरिया तथा हरीश भारती एवं उनके साथियों द्वारा उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध वाद्ययंत्रों ढोल दमाऊँ, मशकवीन. हुड़का आदि का वादन कर शानदार प्रस्तुति दी गयी।

कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय दसांईथल गंगोलीहाट पिथौरागढ़ की छात्राओं ने अपनी प्रधानाचार्य रेनू शाह के निर्देशन में छोलिया नृत्य का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। कार्यशाला कार्यक्रम नोडल पल्लवी नैन उप राज्य परियोजना निदेशक, अजीत भण्डारी उप राज्य परियोजना निदेशक समग्र शिक्षा के संयोजन में अखिलेश ध्यानी नवीन नेगी के समन्वयन में संचालित हो रही है। कार्यशाला में ओमप्रकाश सेमवाल, गिरीश सुन्दरियाल, डा० संजय पाण्डे, डा० पवन कुदवाण ओमबधानी, रेनु शाह, ऊषा कटियार, भगत कण्डवाल आदि प्रतिभागिता कर रहे हैं। उद्घाटन सत्र का संचालन गिरीश बडोनी एवं धर्मेन्द्र नेगी ने किया।

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