वृक्षाबंधन अभियान की छठवीं विमर्श गोष्ठी में राजधानी की हरीतिमा को बचाने पर हुआ गहन मन्थन

देहरादून

हिमालय प्रबंधन नीति एवं मानव जनित आपदाओं पर जारी विमर्श श्रंखलाओ के क्रम में शनिवार को बीजापुर राज्य अतिथि गृह में संगोष्ठी का आयोजन किया गया।

संगोष्ठी दो सत्रों में संपन्न हुई जिसमें प्रथम सत्र में अध्यक्षता दिनेश सक्सेना पूर्व प्राचार्य डीवी महाविद्यालय एवं द्वितीय सत्र की अध्यक्षता देवेन्द्र कैंथोला अंतर्राष्ट्रीय परामर्शदाता द्वारा की गई संगोष्ठी में विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने अपनी रचनात्मक भागीदारी विमर्श संगोष्ठी में प्रदान की जिनमें सिटीजन फॉर ग्रीन दून, धाद, संयुक्त नागरिक संगठन दून, शाखा क्लब, उत्तराखंड प्रोफेशनल इंस्टीट्यूट एसोसिएशन, वीरभद्र वेलफेयर सोसाइटी फैंस इत्यादि ने भागीदारी की। विमर्शंगति का प्रारंभ व्याख्यान पत्र पढ़ने के उपरांत किया गया।

व्याख्यान पत्र में राजधानी देहरादून की समस्याओं को व्यापक रूप में उकेरा गया। यह व्याख्यानपत्र वृक्षाबंधन अभियान के संस्थापक एवं विचारक सैनिक शिरोमणि मनोज ध्यानी द्वारा पढ़ा गया। व्याख्यानपत्र में कथन किया गया।

व्याख्यान पत्र की प्रतियों को सभी प्रतिभागी संस्थाओं के प्रतिनिधियों को बांटने के उपरांत विमर्श गोष्ठी संपन्न हो गई।

विमर्शी में धाक के मेजर सेवानिवृत्त महावीर सिंह रावत ने पलायन के विषय को उठाते हुए इसे देहरादून नगर पर एक बड़े दबाव के रूप में

बात रखी उन्होंने विराट देहरादून की संकल्पना का खाका खींचते हुए धुलेरा गुजरात के तर्ज पर नगर विनिर्माण की बात को सदन के समक्ष रखा।

संयुक्त नागरिक संगठन दून के महासचिव सुशील त्यागी ने देहरादून को एक कंक्रीट का जंगल बनते हुए इसे नगर के लिए खतरनाक बताया। उन्होंने विकास नीति मे खामी को उकेरा।

बोलते हुए पर्यावरणविद अवधेश शर्मा ने कहा कि राजधानी का विषय जनता के प्रतिनिधियों के लिए फुटबॉल का गेम के समान बनकर रह गया है।

उन्होंने पेड़ और भेड़ की नीति को लागू करने एवं इस विषय पर पॉलिसी पैरालिसिस की बात को मजबूती से रखते हुए निर्माण पर प्रतिबंध की वकालत की। विमर्श संगोष्ठी में युवा पर्यावरण विद मनोज बिजवार ने पर्यावरण को बुनियादी शिक्षा का हिस्सा बनाए जाने की बात रखी। उन्होंने कहा कि जहां नौकरशाही स्थायी होती है एवं उसका कार्यकाल 3035 वर्ष का होता है वहीं राजनेताओं का कार्यकाल कम समय होने के कारण बहुत से नीतिगत खामियां। एवं अच्छी नीतियां भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं। 87 वर्षीय प्रकाश नांगिया का कहना था कि राजधानी अवश्य ही बदलनी चाहिए। उन्होंने 1935 में भूकंप में आई तबाही का संस्मरण सुनाया जिस समय उनका परिवार के कई सदस्य मृत्यु को प्राप्त हो गए थे। उन्होंने उदाहरण देकर बताया कि देहरादून के कबाड़ी बाज़ार को ट्रैफिक के लिए हटाया गया था परन्तु आज वहां पर पार्किंग स्थल बनकर रह गया है। उन्होंने देहरादून में फ्री पार्किंग की सुविधा बनाने का सुझाव पेश किया। विमर्श संगोष्ठी में डॉ ताराचंद गुप्ता ने बाहर से आई। गाड़ियों के लिए शहर से ही बाहर पार्किंग की व्यवस्था एवं नगर के भीतर इंटरनल ट्रैफिक सिस्टम मोनोरेल बैटरी बसिस बैटरी रिक्शा आदि के उपाय बनाकर सस्टेनेबल तरीकों को अपनाने पर जोर दिया। उत्तराखंड उत्तराखण्ड आंगनवाड़ी एवं कार्य संगठन कि प्रदेश अध्यक्ष श्रीमती रेखा नेगी ने कहा कि हमें समस्याओं का समाधान का मसौदा तैयार करके सरकार के समक्ष रखना चाहिए और अपने मांग पत्र पर कार्यवाही मांगते हुए उत्तराखंड में अराजकता का जो माहौल पैदा हो चुका है उसका समाधान मांगना चाहिए। विमर्शी में उत्तराखण्ड निजी संस्थान एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ॰ सुनील अग्रवाल ने कहा कि बहुत सारी योजनाएँ जैसे कि नियो रेल परियोजना केवल सर्वे तक सीमित रखी गई।

उन्होंने नगर निगम की सड़क पर पार्किंग की व्यवस्था को एक गलत नीति करार दिया। डॉक्टर सुनील अग्रवाल ने विनय माण पर रोक लगाने के साथ-साथ ट्रैफिक सेंस विकसित करने पर भी जोर दिया। विमर्श संगोष्ठी में फैंस के संयोजक पुनीत नंदा ने कहा कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? उत्तराखण्ड में कृषि भूमि गजों के हिसाब से बेची जा रही है जबकि कृषि भूमि संरक्षित की जानी चाहिए। उन्होंने बताया कि उत्तराखंड के तराई क्षेत्रों में या उसके आसपास लगभग पूरा लैंडबैंक बिक सा चुका है। उन्होंने कहा कि

राजधानी देहरादून के कुछ एक क्षेत्र जैसे कि डोईवाला भान्यावाला विकास नगर को अभी भी भूमाफियों की ग्रिप से बचाया जा सकता है।

उन्होंने परामर्श दिया कि जो बचा हुआ है उसे संभाला जाना चाहिए। विमर्शी में डॉ हरीश मैखुरी ने पहाड़ों में बंदर भालू और सुअर के आतंक को उत्तराखण्ड की आर्थिकी पर एक घातक प्रहार माना और इसके निदान हेतु उपाय मांगे डॉ हरीश मैकरी ने सुझाव दिया कि उत्तराखण्ड के समस्त जल स्रोतों पर कोई भी विनिर्माण नहीं किया जाना चाहिए। इस हेतु कठोर उपाय बनाए जाने चाहिए। सिटीजन फॉर ग्रीन दून के अध्यक्ष हिमांशु अरोड़ा ने उत्तराखंड में विनिर्माण की गतिविधियों के लिए हजारों पेड़ छपान के उदाहरण देकर बताया कि यह एक पाँव पर कुल्हाड़ी मारने की नीति के समान हैं। मानसू अरोड़ा ने प्रश्न किया कि हमारे नीतिकारों को देहरादून नगर मसूरी और उत्तराखंड के अन्य हिमालय नगरों में भार वहन क्षमता को मापक बनाना चाहिए और किसी भी सूरत में ऐसी तंत्रिका नहीं निर्मित करनी चाहिए जिससे कि नगरों पर भारी दबाव बने साधन संकुचित हो और सस्मिक 6 जून में आए। उत्तराखंड में आपदा

को बुलावा भेजा जाए। मानसू अरोड़ा ने कहा कि सड़कों के निर्माण से जितनी दिल्ली पास आई है उतना विनाश नजदीक पहुँचा है। उन्होंने इंड डिमांड के सिद्धांत को आगे रखते हुए कहा कि इससे एक ऐसा चक्र निर्मित हो रहा है जिससे नागरिकों की जीवनरेखा घट रही है और प्रदूषण भयावह रूप धारण करने लगा है। विमर्शी में वीरभद्र वेलफेयर सोसाइटी की अध्यक्ष श्रीमती अनिता शास्त्री ने कहा कि उत्तराखंड में पर्यावरण एक खतरनाक रूप धारण कर रहा है और जो भारी बदलाव दिख रहे हैं उससे निपटने के उपाय किए जाने चाहिए। उन्होंने देहरादून से नई जागृति अभियान प्रारंभ करने का सुझाव रखा। पैरा क्रिकेट एसोसिएशन की राष्ट्रीय अध्यक्ष भूमि यादव ने उन छोटे छोटे कदमों को उठाने का सुझाव दिया जिससे पर्यावरण पर प्रतिकूल असर से बचा जा सके। उन्होंने सौर ऊर्जा राख से बनी ईंटों समारोहों में पत्तल प्रयोग नारियल के भूसे से बने गिलासों मिट्टी के गमलों मिट्टी के दीयों एवं वाहनों के टायर इत्यादि के रीसाइक्लिंग अथवा पर्यावरणीय प्रयोग तलाशने की बात कही।

गोष्ठी के प्रथम सत्र में अपने अध्यक्ष उद्बोधन में डीएवी महाविद्यालय के प्राचार्य दिनेश सक्सेना ने कहा कि 25 वर्षों में पर्यावरणीय दृष्टि से काफी विकास और विनाश दोनों ही एक समान हुआ है। उन्होंने उन्होंने कहा कि एनालिसिस क्रिएट्स पैरालिसिस और उनका कथन था कि हमें दार्शनिक दृष्टिकोण से नहीं बल्कि प्रयोगात्मक दृष्टिकोण से प्रत्येक विषय का आकलन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि पेड़ों का भारी मात्रा में छपान किया जाना किसी भी नगर के लिए दुर्भाग्यपूर्ण विषय कहलाएगा और उन्होंने अपनी बात को शायराना अंदाज में यह कहते हुए कि लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई के साथ त्रिस्तरीय सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक विकास का ढांचा संतुलित भाव से आगे बढ़ाने पर जोर दिया।

संगोष्ठी के दौरान सिमरन ठाकुर, सलोनी गुप्ता, हरमनप्रीत कौर, दिया, इंदिरा आदि युवाओं ने भी अपने विचार रखे। अन्य लोगों में वरिष्ठ पत्रकार मंगेश कुमार, सिटीजन फॉर ग्रीन दून की निधि सूद, पूनम ध्यानी, कुमारी बबली कुमारी, चांदनी, कुमारी महक योगेश, अनिकेत, अनमोल यादव, शीतल सैनी, दिव्यांत शर्मा, अरुणादित्य आदि स्वयंसेवी उपस्थित रहे।

विमर्शी में अपने अध्यक्षीय संबोधन में अंतर्राष्ट्रीय परामर्शदाता इंटरनैशनल स्ट्रेटजी कंसल्टेंट देवेन्द्र कैंथोला ने कहा कि हमें क्रिया प्रतिक्रिया के सिद्धांत को समझते हुए क्रिया के सिद्धांत पर अमल करना चाहिए। उन्होंने स्ट्रेटजी चेंज मैनेजमेंट के कई पहलुओं को छूते हुए राजनीतिक आर्थिक सामाजिक एवं तकनीकी क्षेत्रों में संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल गोल्स की अवधारणा के अनुरूप राजधानी पर कार्य करने के सुझाव। देवेंद्र कंथुला ने पर्यावरण दृष्टिगत आर्थिक विकास की अवधारणा को अपनाने पर जोर दिया।

उन्होंने बताया कि हमें उस उत्तराखंड को प्राप्त करना चाहिए जो कि 80 के दशक में दस लाख टन खाद सामग्री निर्यात करता था ना कि वह उत्तराखंड जो आज 150 ट्रक प्रतिदिन खाद्य सामग्री आयात करता है। इसी को उन्होंने विकास की धुरी भी बताया।

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